06 April, 2019

गुजारा भत्ता कानून - कितना न्यायोचित...?


हिन्दू विवाह अधिनियम भारत की संसद द्वारा सन् 1955 में पारित एक कानून है। इसी कालावधि में एक कानून पारित हुआ जिसे भरणपोषण अधिनियम (1956) के नाम से जाना जाता है | इस कानून का निर्माण महिलाओं की स्थिति को ध्यान में रखते हुए किया गया था | आजादी के बाद भी भारत में महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षणिक स्थिति का स्तर बहुत निम्न था | जिसे सुधारने के लिए तत्कालीन सरकार ने अथक प्रयास किया |  जिसमे प्रमुख सुधार हिन्दू विवाह अधिनियम का निर्माण करना था |

क्या है गुजारा भत्ता कानून 
इस कानून के तहत कोई व्यक्ति बाध्य हैं कि वे अपनी पत्नी, बच्चे, और माता- पिता का, जो उनसे विशेष संबंध रखते हैं, भरणपोषण करें । इन सभी को भरणपोषण (Maintenance) या गुजारा भत्ता पाने का अधिकार है । भरणपोषण में अन्नवस्त्र एवं निवास ही नहीं बल्कि आश्रित व्यक्ति के स्तर की सुख और सुविधा की वस्तुएँ को भी सम्मिलित किया गया हैं। भरण पोषण कानून के तहत यह प्रावधान किया गया है कि यदि पत्नी, बच्चे, और माता- पिता अपनी देखभाल करने में सक्षम नहीं हों तो कोई पुरुष उनकी जिम्मेदारी से भाग नहीं सकता | यह उसका कर्तव्य है कि वह उन्हें गुजारा भत्ता दे | इस कानून के तहत यदि महिला कमा भीं रही है, तो भी पति के साथ मतभेद पैदा होने पर उसे गुजारा भत्ता दिया जायेगा | यह नियम इसलिए बनाया गया है ताकि वह पति की तरह सम्मान के साथ अपना जीवनयापन कर सकें | यदि पत्नी उचित कारणवशजैसे पति के दुष्टतापूर्ण व्यवहार के कारण या उसके संक्रामक रोगों से आक्रांत होने के कारणपति से अलग रहती है तब भी वह पोषण की अधिकारिणी है । पति के उत्तराधिकारी से भी वह अधिकार की माँग कर सकती है किंतु यह आवयक है कि वह अविवाहित और सुचरित्र रहे।


मासिक भुगतान
सुप्रीम कोर्ट ने मासिक गुजारा भत्ता की सीमा तय कि है | यह पति की कुल सैलरी का 25% से ज्यादा नहीं हो सकता | पति की सैलरी में बदलाव होने पर इसे बढाया या घटाया जा सकता है |

यह कानून बनाने की आवश्यकता क्यों हुई ?
20 वीं शताब्दी में महिलाओं की सामाजिक स्थिति ठीक नहीं थी | उस वक़्त महिलाएं पुरुषों पर निर्भर हुआ करती थी | शिक्षा के क्षेत्र में भी महिलाएं पिछड़ी हुई थी | शिक्षित न होने की वजह से महिलाओं को पुरुषों पर आश्रित माना गया | महिलाओं को रोजगार के लिए घर से बाहर निकने से भी मनाही थी | जिसकी वजह से वे अपना भरण पोषण नहीं कर पाती थी |

क्या पति- पत्नी के बीच विवाद कि स्थिति में गुजारा भत्ता दिया जाना चाहिए .?
हिन्दू विवाह अधिनियम के तहत पति से विवाद की स्थिति में पत्नी को भरणपोषण पाने का अधिकार हैचाहे पति के पास संपत्ति हो अथवा न हो । विवाह के पश्चात् कानूनन पति को उसकी पत्नी का एटीएम मशीन बना दिया जाता है | जो जब चाहे पति से पैसों की मांग कर सकती है | 
भारत में पति और पत्नी के बीच विवाद पैदा होने पर पत्नी को बहुत से क़ानूनी अधिकार प्राप्त है, जिसका दुरूपयोग करते हुए वह बदले की भावना से अपने पति और उसके परिवार वालों पर दहेज़ प्रताड़ना, घरेलु हिंसा आदि जैसे कानून के तहत मुकदमा दर्ज करवा देती है | साथ ही साथ गुजारा भत्ता कानून के तहत उसी पति से जीवनयापन के लिए पैसा भी मांगती है | अर्थात पति और उसके परिवार वालों को झूठे मामले में सजा भी दिलवाना चाहती है और दूसरी तरफ उसी के पैसे से जीवनयापन भी करना चाहती है | इस दोहरे मापदंड के साथ वह न केवल कानून का दुरूपयोग कर रही है, बल्कि उन महिलाओं के साथ भी अन्याय कर रही है जो वास्तविकता में  भरण- पोषण कानून की हक़दार है | 
वर्तमान परिपेक्ष्य में गुजारा भत्ता कानून की आवश्यकता 
वक़्त बदलने के साथ महिलाओं के शिक्षा में सुधार कार्य किये गए | बालिकाओं की शिक्षा हेतु अनेक सरकारी योजनाएं बनाई गई | जिसका लाभ महिलाओं को प्रत्यक्ष रूप से मिला है | 21 शताब्दी में महिलाएं पुरुषों की तुलना में अधिक पढ़ी- लिखी हो रही है | समाज में भी महिलाओं के नौकरी करने की प्रथा का समर्थन किया जा रहा है | वक़्त बदला, समाज भी बदला मगर गुजारा भत्ता कानून अभी भी वही का वही है | आज भी पत्नी को पति के ऊपर आश्रित माना जाता है | जबकि महिलाएं पुरुषों से ज्यादा पढ़ी- लिखी और ज्यादा योग्य हो रही है | जब एक महिला की शिक्षा एक पुरुष के बराबर हो रही है तो वही महिला विवाह के पश्चात पुरुष पर आश्रित कैसे हो सकती है.? बराबर शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात भी उस महिला को अबला कैसे माना जा सकता है.? महिला सशक्तिकरण के इस दौर में महिलाएं  पुरुषों से आगे निकलती दिखाई दे रही है, किन्तु कानून के समक्ष आज भी महिलाओं को विशेष संरक्षण प्राप्त है | समय आ गया है की इस प्रकार के कानून में बदलाव किया जाये | एक महिला स्कूल से लेकर कॉलेज तक पुरुष के बराबर शिक्षा ग्रहण करती है तो समानता के अधिकार के तहत वह महिला गुजारा भत्ता की हक़दार भी नहीं होनी चाहिए | किन्तु न्यायालय के द्वारा पुरुषों पर दबाव बनाया जाता है कि वह अपनी पत्नी का भरण- पोषण करें | यहाँ तक की गुजारा भत्ता नहीं दे पाने की स्थिति में पति ( पुरुष ) को जेल तक में डाल दिया जाता है | जिसका नतीजा हमें इस प्रकार से भी देखने को मिलता है |
जब महिला सक्षम है, पढ़ी- लिखी है तो देश के विकास में उसे स्वयं अपना भरण- पोषण करना चाहिए न की गुजारा- भत्ता रूपी भीख के भरोसे जिन्दा रहना चाहिए | 
दिल्ली हाई कोर्ट ने भी एक निर्णय में कहा है कि "अलग हुए पति पर बोझ मत बनो, काबिल हो नौकरी करो" |

सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि "गुजारा भत्ता देने का मतलब यह नहीं है कि बेरोजगारों की फ़ौज इक्ठटा किया जाये" 

आज- कल की महिलाएं "माय बॉडी, माय चॉइस" का नारा लगाती है | वैसे ही उन्हें अपना जीवनयापन के लिए भी नारा लगाना चाहिए- "मेरा शरीर, अपना भरण-पोषण स्वयं करुँगी" | हिन्दू विवाह अधिनियम के तहत लगभग 65 साल पुराने बने कानून की समीक्षा करने का वक़्त आ गया है | वो वक़्त आ गया है कि पढ़ी- लिखी महिला (पत्नी) को पति के ऊपर आश्रित न समझा जाये | एक महिला अबला होती है इस धारणा को भी बदलने का वक़्त आ गया है | एक पढ़ी- लिखी महिला अपना गुजर- बसर स्वयं कर सकती है, इस बात को समझने का वक़्त आ गया है | देश के विधि निर्माताओ से भी आग्रह है कि इस एकपक्षीय लिंग आधारित कानून में संसोधन करें और इसे न्यायोचित बनाने का कार्य अतिशीघ्र करें |

नववर्ष की शुभकामनाओ के साथ.....












20 March, 2019

भक्त प्रह्लाद रूपी पुरुषों की रक्षा कौन करेगा....?



होलिका दहन के साथ ही अगले दिन होली का त्योहार मनाया जाता है | होली खुशियाँ बाटने, एक दुसरे से प्रेम जताने, प्रकृति को रंगों से सजाने, दिलों में पनप रहे नफ़रत को भुलाने, आपसी भाईचारे, परिवार और समाज में उत्पन्न हो रहे मतभेदों को भुलाने का त्यौहार है | होलिका दहन, बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है | भक्त प्रह्लाद को मारने के लिए राक्षस हिरन्य कश्यप और होलिका ने बहुत प्रयास किया | भक्त प्रह्लाद को होलिका ने अग्नि में जलाने का प्रयास किया किन्तु वह अपने प्रयास में असफल रही थी और वह स्वयं ही अग्नि में जलकर भस्म हो गई, जबकि भक्त प्रह्लाद को कुछ नहीं हुआ | 
हिरन्य कश्यप जैसे राक्षस हमारे समाज में आज भी मौजूद है, जो भक्त प्रह्लाद जैसे पुरुषों को ख़त्म करने के प्रयास में लगे हुए है | हिरन्य कश्यप रूपी राक्षस एकपक्षीय महिला कानून जैसे- दहेज प्रताड़ना, घरेलु हिंसा, यौन शोषण, अनाचार, छेड़-छाड़ इत्यादि कानूनों का निर्माण कर रहे है | इन कानूनों का निर्माण केवल और केवल प्रह्लाद रूपी पुरुषों को प्रताड़ित करने के लिए किया जा रहा है | इन कानूनों की प्रताड़ना से तंग आकर हजारों की तादाद में निर्दोष पुरुष आत्महत्या तक कर ले रहे है | पुरुषों को भी अपने मान- सम्मान की रक्षा के लिए ये आत्मघाती कदम उठाना पड़ रहा है | इन झूठे आरोपों के लगने मात्र से समाज उन्हें अपराधिक नज़र से देखने लगता है | 

होलिका जैसी महिलाएं आज भी हमारे समाज का हिस्सा हैं जो भक्त प्रह्लाद रूपी पुरुषों को जलाने का प्रयास कर रही है | होलिका रूपी महिलाएं एकपक्षीय महिला कानूनों का दुरूपयोग करते हुए झूठे दहेज प्रताड़ना, झूठे घरेलु हिंसा, झूठे यौन शोषण, झूठे अनाचार, झूठे छेड़- छाड़ जैसे मामले दर्ज करवाकर प्रह्लाद रूपी पुरुषों को जलाने के कार्य में लगी हुई है | इन झूठे आरोपों का शिकार निर्दोष पुरुष वर्ग हो रहा है | आखिर कब तक पुरुष इन एकपक्षीय कानूनों के शोषण का शिकार होता रहेगा ? वो वक़्त आ गया है जब इन एक एकपक्षीय कानूनों में संसोधन किया जाना चाहिए | यदि पुरुषों पर आरोप झूठा साबित होता है तो झूठा आरोप लगाने वाली महिलाओं को भी सज़ा का प्रावधान हमारे देश के संविधान में होना चाहिए | कानून के निर्माताओ को भी कानून बनाते समय यह ध्यान देना होगा कि देश के सभी नागरिको के मौलिक अधिकारों में से एक "समानता के अधिकार" का पुर्णतः पालन हो |

सत युग, त्रेता युग और द्वापर युग में भक्त की रक्षा करने स्वयं भगवान अवतरित होते रहे है, किन्तु कलयुग में भक्त प्रह्लाद रूपी पुरुषों की रक्षा कौन करेगा.? होलिका और हिरन्य कश्यप जैसे राक्षसों को सज़ा कौन देगा.? 

इन विचारणीय प्रश्नों के साथ होली की हार्दिक शुभकामनाएं |

16 March, 2019

शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ते बालक......


स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से विश्व पटल पर भारत एक विकासशील देश में गिना जाता रहा है | शिक्षा के क्षेत्र में भी हमारा देश विकास की नई इबारत लिखता आ रहा है | बालिका शिक्षा को बढावा देने के लिए स्वतंत्र भारत में नई- नई योजनाएं शुरू की गई | इससे बालिका शिक्षा को प्रोत्साहन के साथ- साथ एक नई दिशा भी मिली, किन्तु बालकों के शिक्षा पर सरकारों ने कोई योजना नहीं बनाई या दुसरे शब्दों में ये कहे की बालको के शिक्षा को  बढावा देने के लिए योजना ठंडे बस्ते में ही रह गई | इसका दूरगामी परिणाम हमें छत्तीसगढ़ राज्य में पिछले कुछ वर्षो के दौरान एक सर्वे में देखने मिला है कि उच्च शिक्षा प्राप्त करने में लडको की तुलना में लड़कियों की संख्या का अनुपात 1:1.46 है | अर्थात बालको की तुलना में बालिकाएं उच्च शिक्षा प्राप्त करने में आगे रही है | 




एक सर्वे के मुताबिक छत्तीसगढ़ राज्य में हर वर्ष कक्षा आठवीं के बाद पढाई छोड़ने वाले बच्चों में लड़कियों के मुकाबले लड़को की संख्या अधिक है | आंकड़ो में लडको के द्वारा पढाई छोड़ने का कारण "रोजगार की तलाश" अर्थात "काम के लिए" बताया गया है | इससे न केवल छत्तीसगढ़ में बल्कि पुरे भारत में सामाजिक असंतुलन की स्थिति निर्मित होती दिखाई दे रही है | जो न केवल भारत के विकास में बाधक तत्व साबित होगी बल्कि सामाजिक संतुलन के सिद्धांत के लिए भी खतरा होगी | यह बहुत ही गंभीर विषय है कि आखिर क्यों...? 14 वर्ष के बाद लड़को को परिवार की जिम्मेदारी उठाने के लिए विवश होकर पढाई बीच में ही छोड़ना पड़ रहा है? हमारे समाज के लिए भी यह एक विचारणीय प्रश्न है कि बालको में गिरते शिक्षा का स्तर ऊपर उठाने के लिए क्या परिवर्तन किया जाना चाहिए? 

केंद्र और राज्य सरकार को इन आंकड़ो को गंभीरता से लेकर बालको की शिक्षा के लिए नए सिरे से योजना बनाने की आवश्यकता है | |