20 March, 2019

भक्त प्रह्लाद रूपी पुरुषों की रक्षा कौन करेगा....?



होलिका दहन के साथ ही अगले दिन होली का त्योहार मनाया जाता है | होली खुशियाँ बाटने, एक दुसरे से प्रेम जताने, प्रकृति को रंगों से सजाने, दिलों में पनप रहे नफ़रत को भुलाने, आपसी भाईचारे, परिवार और समाज में उत्पन्न हो रहे मतभेदों को भुलाने का त्यौहार है | होलिका दहन, बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है | भक्त प्रह्लाद को मारने के लिए राक्षस हिरन्य कश्यप और होलिका ने बहुत प्रयास किया | भक्त प्रह्लाद को होलिका ने अग्नि में जलाने का प्रयास किया किन्तु वह अपने प्रयास में असफल रही थी और वह स्वयं ही अग्नि में जलकर भस्म हो गई, जबकि भक्त प्रह्लाद को कुछ नहीं हुआ | 
हिरन्य कश्यप जैसे राक्षस हमारे समाज में आज भी मौजूद है, जो भक्त प्रह्लाद जैसे पुरुषों को ख़त्म करने के प्रयास में लगे हुए है | हिरन्य कश्यप रूपी राक्षस एकपक्षीय महिला कानून जैसे- दहेज प्रताड़ना, घरेलु हिंसा, यौन शोषण, अनाचार, छेड़-छाड़ इत्यादि कानूनों का निर्माण कर रहे है | इन कानूनों का निर्माण केवल और केवल प्रह्लाद रूपी पुरुषों को प्रताड़ित करने के लिए किया जा रहा है | इन कानूनों की प्रताड़ना से तंग आकर हजारों की तादाद में निर्दोष पुरुष आत्महत्या तक कर ले रहे है | पुरुषों को भी अपने मान- सम्मान की रक्षा के लिए ये आत्मघाती कदम उठाना पड़ रहा है | इन झूठे आरोपों के लगने मात्र से समाज उन्हें अपराधिक नज़र से देखने लगता है | 

होलिका जैसी महिलाएं आज भी हमारे समाज का हिस्सा हैं जो भक्त प्रह्लाद रूपी पुरुषों को जलाने का प्रयास कर रही है | होलिका रूपी महिलाएं एकपक्षीय महिला कानूनों का दुरूपयोग करते हुए झूठे दहेज प्रताड़ना, झूठे घरेलु हिंसा, झूठे यौन शोषण, झूठे अनाचार, झूठे छेड़- छाड़ जैसे मामले दर्ज करवाकर प्रह्लाद रूपी पुरुषों को जलाने के कार्य में लगी हुई है | इन झूठे आरोपों का शिकार निर्दोष पुरुष वर्ग हो रहा है | आखिर कब तक पुरुष इन एकपक्षीय कानूनों के शोषण का शिकार होता रहेगा ? वो वक़्त आ गया है जब इन एक एकपक्षीय कानूनों में संसोधन किया जाना चाहिए | यदि पुरुषों पर आरोप झूठा साबित होता है तो झूठा आरोप लगाने वाली महिलाओं को भी सज़ा का प्रावधान हमारे देश के संविधान में होना चाहिए | कानून के निर्माताओ को भी कानून बनाते समय यह ध्यान देना होगा कि देश के सभी नागरिको के मौलिक अधिकारों में से एक "समानता के अधिकार" का पुर्णतः पालन हो |

सत युग, त्रेता युग और द्वापर युग में भक्त की रक्षा करने स्वयं भगवान अवतरित होते रहे है, किन्तु कलयुग में भक्त प्रह्लाद रूपी पुरुषों की रक्षा कौन करेगा.? होलिका और हिरन्य कश्यप जैसे राक्षसों को सज़ा कौन देगा.? 

इन विचारणीय प्रश्नों के साथ होली की हार्दिक शुभकामनाएं |

16 March, 2019

शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ते बालक......


स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से विश्व पटल पर भारत एक विकासशील देश में गिना जाता रहा है | शिक्षा के क्षेत्र में भी हमारा देश विकास की नई इबारत लिखता आ रहा है | बालिका शिक्षा को बढावा देने के लिए स्वतंत्र भारत में नई- नई योजनाएं शुरू की गई | इससे बालिका शिक्षा को प्रोत्साहन के साथ- साथ एक नई दिशा भी मिली, किन्तु बालकों के शिक्षा पर सरकारों ने कोई योजना नहीं बनाई या दुसरे शब्दों में ये कहे की बालको के शिक्षा को  बढावा देने के लिए योजना ठंडे बस्ते में ही रह गई | इसका दूरगामी परिणाम हमें छत्तीसगढ़ राज्य में पिछले कुछ वर्षो के दौरान एक सर्वे में देखने मिला है कि उच्च शिक्षा प्राप्त करने में लडको की तुलना में लड़कियों की संख्या का अनुपात 1:1.46 है | अर्थात बालको की तुलना में बालिकाएं उच्च शिक्षा प्राप्त करने में आगे रही है | 




एक सर्वे के मुताबिक छत्तीसगढ़ राज्य में हर वर्ष कक्षा आठवीं के बाद पढाई छोड़ने वाले बच्चों में लड़कियों के मुकाबले लड़को की संख्या अधिक है | आंकड़ो में लडको के द्वारा पढाई छोड़ने का कारण "रोजगार की तलाश" अर्थात "काम के लिए" बताया गया है | इससे न केवल छत्तीसगढ़ में बल्कि पुरे भारत में सामाजिक असंतुलन की स्थिति निर्मित होती दिखाई दे रही है | जो न केवल भारत के विकास में बाधक तत्व साबित होगी बल्कि सामाजिक संतुलन के सिद्धांत के लिए भी खतरा होगी | यह बहुत ही गंभीर विषय है कि आखिर क्यों...? 14 वर्ष के बाद लड़को को परिवार की जिम्मेदारी उठाने के लिए विवश होकर पढाई बीच में ही छोड़ना पड़ रहा है? हमारे समाज के लिए भी यह एक विचारणीय प्रश्न है कि बालको में गिरते शिक्षा का स्तर ऊपर उठाने के लिए क्या परिवर्तन किया जाना चाहिए? 

केंद्र और राज्य सरकार को इन आंकड़ो को गंभीरता से लेकर बालको की शिक्षा के लिए नए सिरे से योजना बनाने की आवश्यकता है | |